मेरे राम

मेरे राम, कभी कबीर के दोहे में दिखे, तो कभी राष्ट्रपिता के भजनो में,
पर हमेशा दिखाई दिए तो अवध की उन गलियों मे।

कलयुग का यह वनवास कोर्ट-कचहरी में ऐसा उलझा की त्रेता युग के १४ वर्षो को भी पीछे छोड़ा गया।

आस लगाए लाखो यह सोचते रहे की कब यह सुनहरी कुटिया दुल्हनसी सजेगी,
कलयुग में हम सब उस शबरी की तरह ही तो है,
जिन्होंने सदियों तक अपने राजाराम का इंतज़ार किया हो।
बेर तैयार रखना, और याद रखना की बेर मीठे हो,
लक्ष्मण भी चखेंगे इस बार।

दूर कही माँ जानकी के मिथिला की वह गालिया भी शायद सजेगी,
जहा राम के होने का एहसास आज भी छूकर चला जाता है।

सदियों बाद वह सुनहरा कोना, जो अपनी चमक को भूल चूका था,
शायद अबकी बार इन दीपो में खुद को ढूंढ लेगा।

सरयू भी युगो-युगो तक इस इंतज़ार में बहती रही, और पुकारती रही,
किसी और की आवाज़ बनती रही।

हनुमान भी आएंगे और अपने साथ सेना भी लाएंगे,
शायद इसी दिन के लिए आपने उन्हें कलयुग के अंत तक रहने का आदेश दिया था।

भक्तो का हुजूम हो ना हो पर दिलो में एक दीप जरूर होगा,
पुष्प हो ना हो एक ख़ुशी का आंसू तो जरूर होगा,
में रहू या ना रहू पर मेरे राम का स्वागत जरूर होगा।

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